Monday 21st of September 2026

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कोरबा : बालको की ‘उन्नति’ परियोजना आर्थिक निर्भरता की मिसाल।

बालको की ‘उन्नति’ परियोजना आर्थिक निर्भरता की मिसाल।

नवरात्रि के अवसर महिला सशक्तिकरण की कहानियां सामाजिक बदलाव की नई संभावना को दर्शाती है।

बालको के सामुदायिक विकास के अंतर्गत स्थानीय महिलाओं ने अपने आत्मनिर्भरता की यात्रा को सशक्त किया है।

छत्तीसगढ़ के बालकोनगर स्थित शांतिनगर की निवासी श्रीमती पूनम सिंह कहती हैं कि मेरे पास एक सपना था, लेकिन कभी नहीं सोचा था कि मेरी कला मुझे आत्मनिर्भर बना सकती है।

आज मैं अपना व्यवसाय चला रही हूँ, परिवार के निर्णयों में सक्रिय रूप से शामिल होती हूँ, और दूसरों को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हूँ।

इनकी कहानी भारत एल्यूमिनियम कंपनी लिमिटेड (बालको) की पहल ‘प्रोजेक्ट उन्नति’ से जुड़ी अनेक महिलाओं के बदलाव को दर्शाती है।

उन्होंने महिला सशक्तिकरण पहल ‘उन्नति’ के माध्यम से अपनी पहचान और आत्मनिर्भरता पाई, जो कभी केवल बचत समूहों में बैठकर विचार साझा करने से शुरू हुआ था। वह आज आत्मविश्वास, साहस और आत्मनिर्भरता की प्रेरक कहानियों में बदल चुका है।

पूनम याद करते हुए बताती हैं कि कैसे घर पर सजावटी वस्तुएँ बनाने का उनका शौक धीरे-धीरे ‘डेकोरट्टी’ नामक सूक्ष्म उद्यम में बदल गया। उन्होंने बताया कि पहले मैं केवल दोस्तों और परिवार के लिए ही वस्तु बनाती थी। उन्नति से जुड़कर मैंने सीखा कि कैसे अपने बनाई वस्तु की कीमत, ग्राहकों से बात करने और यहाँ तक कि सोशल मीडिया का उपयोग करना है।

आज जब त्योहारों पर लोग अपने घरों को सजाते हैं, तो मुझे संतोष होता है कि मेरे बनाए उत्पाद उनके उत्सव का हिस्सा बन रहे हैं।

इसी तरह की सफलताएँ कई और महिलाओं की कहानियों में दिखाई देती हैं।

श्रीमती रथ बाई उन्नति की ‘छत्तीसा’ नामक फूड-आधारित उद्यम से जुड़ी हैं। अपने शुरुआती दिनों को याद कर कहती हैं कि शुरुआत में मुझे अपने क्षेत्र से बाहर उत्पाद बेचने का अनुभव नहीं था।

उन्नति ने मुझे ऑर्डर प्रबंधन और अपने उत्पादों का प्रचार करना सिखाया। ग्राहक का बार-बार दोबारा ऑर्डर मेरे उद्यम की विश्वसनीयता को मजबूत करता है।

कुछ महिलाओं के लिए यह यात्रा केवल व्यवसाय तक सीमित नहीं रही, बल्कि आर्थिक निर्भरता की मिसाल हैं।

श्रीमती मालती गोस्वामी बताती हैं कि शिक्षा ने मुझे बुनियादी ज्ञान दिया, और वित्तीय प्रशिक्षण ने साहस और आत्मविश्वास से सशक्त किया। अब मैं अपने व्यवसाय का लेखा-जोखा लाभ-हानि का आकलन खुद करती हूँ और भविष्य की योजना बनाती हूँ।

पहले मैं दूसरों से मार्गदर्शन लेती थी, लेकिन आज हमारी समूह की महिलाएँ मुझसे सलाह लेती हैं। यह बदलाव न केवल मेरे लिए, बल्कि हमारे समूह की सभी महिलाओं के लिए सशक्तिकरण का प्रतीक है।

सबसे प्रेरक पहलू इस सामूहिक परिवर्तन में नज़र आता है। जो महिलाएँ पहले सार्वजनिक रूप से बोलने में संकोच करती थीं, आज आत्मविश्वास के साथ अपने स्वयं सहायता समूहों का नेतृत्व कर रही हैं।

श्रीमती सरला यादव कहती हैं कि जब हम साथ बैठते हैं, तो केवल बचत या योजनाओं की चर्चा नहीं होती। हम अपने सपनों पर बात करते हैं, चुनौतियाँ साझा करते हैं और एक-दूसरे का हौसला बढ़ाते हैं।

धीरे-धीरे हमने सीखा है कि हमारी आवाज़ मायने रखती है, और मिलकर हम और आगे बढ़ सकते हैं।

इन कहानियों से यह स्पष्ट होता है कि सशक्तिकरण हमेशा बड़े कदमों से नहीं, बल्कि निरंतर छोटे-छोटे प्रयासों से आता है। हर नया कौशल, हर लिया गया निर्णय और हर स्थापित उद्यम, ये सभी मिलकर महिलाओं की स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता की नई परिभाषा गढ़ रहे हैं।

इस नवरात्रि, जब समाज शक्ति और नारीत्व का उत्सव मना रहा है, पूनम, रथ, मालती, सरला और सैकड़ों अन्य महिलाओं की यह यात्रा हमें याद दिलाती है कि वे केवल उत्पाद या व्यवसाय नहीं बना रही हैं, बल्कि आत्मनिर्भरता और प्रेरणा की ऐसी विरासत गढ़ रही हैं, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए मिसाल बन जाएगी। यह साबित करता है कि जब सपने अवसर से मिलते हैं, तो परिवर्तन अवश्य होता है।

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